बांसवाड़ा नगर परिषद के इतिहास में पहली बार एक पत्रकार के खिलाफ निंदा प्रस्ताव रखा गया

इस नगर परिषद के अंदर कितने ही पार्षद ऐसे हैं जो लगातार चार से पांच बार जीत के आए हैं उनको भी यह नहीं मालूम है कि निंदा प्रस्ताव कब लाया जाता है किसके लिए लाया जाता है इसकी समय अवधि क्या होती है इसको कौन लाता है निंदा प्रस्ताव किसके खिलाफ प्रस्तुत किया जाता है इसका भी संज्ञान बांसवाड़ा के पार्षदों को नहीं है इनको तो निंदा प्रस्ताव और अविश्वास मत में भी अंतर नहीं मालूम हैअब तो सुनने को आ रहा है कि मुझे ही चलता करने का इंतजाम कर लिया गया है अभी व्हाट्सएप पर आया कि मैं फोन कर रहा हूं कि की मै युपी  जा रहा हूँ । यह हंसने की बात नहीं है इस देश का महान लोकतंत्र अगर एक पत्रकार को नहीं बर्दाश्त कर सकता उसके लिए शर्म की बात है  आपने मुझे उठा कर कहीं सेकने की कामना की है  य। तो शर्म की बात है कि गांधी के देश में कभी नहीं हो सकता था जो गांधी अंग्रेजों से लड़ते थे अगर उसे भी शत्रु नहीं कहते थे  मैरे शहर मे  आप मेरा मजाक उड़ा रहे हो 

मैं यही सोच रहा  हूँ  कि क्या एक अदना सा पत्रकार इतना महत्वपूर्ण हो गया उसे विस्थापित करने के लिए हुकूमत इतनी चालें चलेंगे और क्या हम नहीं जानते कि कारपोरेट में टेकओवर कैसे होता है आपने दुनिया का इतिहास नहीं पढ़ा और क्या आप हमेशा-हमेशा यह होता रहा है इसलिए होते रहने देंगे होते रहने दीजिए आपको लगता है कि आप को फर्क नहीं पड़ेगा सर आपको ही फर्क  पड़ेगा पर जब फर्क को पड़ेगा जब आपकी आवाज पहुंचने  कै हर रास्ते बंद कर दिए जाएंगे जवाहरलाल नेहरू ने अमृत बाजार पत्रिका के संपादक को लिखा था कि अखबार आलोचना नहीं करेंगे तो कौन करें 

अगर आलोचना नहीं करेंगे तो सरकार की आलोचना कौन करेगा सरकार की आलोचना करने पर बधाई मिलनी चाहिए क्योंकि बाकी लोग नहीं करते 99 गोदी मीडिया बन गया है और कहो कि तू गोदी मीडिया दूसरी तरफ भी है ने देश को अपनी आंखों से देखिए 

 और आपको नेशनलिज्म का आधा पाठ पढ़ाते हैं उनकी निगाह से मत देखिए वह आपको इस देश की हकीकत से काट कर ले जा रहे हैं

 कॉर्पोरेट हमारा बड़ा कमाल का है उसने पहले मीडिया को नेताओं के यहां पहुंचाया नेताओं ने मीडिया को अपने पास रख लिया अब कारपोरेट मीडिया तो खरीद लेता है कई तरह के  अखबार चैनल भी नहीं पा रहा बेचारा जीएसटी से परेशान है उसका धंधा चौपट है 

कोई बोल नहीं रहा है क्या बात है भाई तुम तो बड़े-बड़े खरीद लेते हो न जनता की आवाज पहुंच रही है और लोग सड़कों पर अपने सवालों को लेकर खड़े हैं 

नगर की जनता आज भी सड़कों पर खड़ी है और पूछती है कि हमारी साफ-सफाई सड़क बिजली की व्यवस्था कब ठीक होगी कब हमें इन आवारा पशुओं से आजादी मिलेगी क्योंकि जब चुनाव हुए थे तो सभापति ने कहा था कि मैं इनको 100 दिन के अंदर हटा दूंगा लेकिन आज ढाई वर्ष पर चुके हैं सभापति ने इनको नहीं हटाया है लोगों के मन में सवाल कई हैं लेकिन इसका जवाब देने वाला कोई भी नहीं है जो प्रतिपक्ष के नेता है हैं वह भी मौन बैठे हुए हैं

निंदा प्रस्ताव और अविश्वास प्रस्ताव में क्या अंतर होता है?

निंदा प्रस्ताव और अविश्वास प्रस्ताव में मुख्य अंतर यह है कि यदि निंदा प्रस्ताव लोकसभा में पारित हो जाता है तो सरकार को किसी तरह का खतरा नहीं होता है लेकिन यदि अविश्वास प्रस्ताव पास हो जाता है तो सरकार गिर जाती है. इस लेख में इन दोनों प्रस्तावों के बीच के अन्य अंतरों के बारे में बताया गया है.

लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत जनता द्वारा चुनी गयी सरकार होती है. लोग अपने मताधिकार का  प्रयोग करके अपने पसंद की सरकार चुनते हैं और उम्मीद करते हैं कि जन प्रतिनिधि उनकी उम्मीदों पर खरे उतरें. लोकतंत्र में पक्ष और विपक्ष एक रथ के दो पहिये जैसे होते हैं. ऐसे कई मौके आते हैं जब विपक्ष, सत्ता में बैठी सरकार के कई मुद्दों से सहमती नहीं रखता है या किसी सरकार के किसी काम को नापसंद करता है तो ऐसी स्थिति में विपक्ष द्वारा निंदा प्रस्ताव और अविश्वास प्रस्ताव जैसे कदम उठाये जाते हैं. इस लेख में इन्ही दो प्रस्तावों में अंतर के बारे में बताया गया है.

कृपया ध्यान दें कि संसद में, तीन प्रकार के निंदा मतदान (censure voting) होते हैं. जिसमें सबसे ऊपर अविश्वास मतदान होता है जिसमें जीतना सरकार के लिए जरूरी होता है ताकि वह सत्ता में बनी रहे. इसके बाद स्थगन प्रस्ताव होता है, इसमें हारने पर सरकार तो नहीं गिरती है लेकिन सरकार की बदनामी होती और निकट भविष्य में सरकार गिरने का खतरा बढ़ जाता

निंदा प्रस्ताव क्या होता है?

यह प्रस्ताव वास्तव में विपक्ष द्वारा सरकार की नीतियों और कार्यों के प्रति असंतोष प्रकट करने या सरकार के कार्यों की निंदा करने के लिए निचले सदन में लाया जाता है. निंदा प्रस्ताव को मंत्रिपरिषद,किसी एक मंत्री या कुछ मंत्रियों के विरुद्ध उनकी नीतियों का विरोध करने या उनके द्वारा काम न करने के विरोधस्वरूप पेश किया जाता है.

अविश्वास प्रस्ताव का क्या मतलब होता है?

अविश्वास प्रस्ताव एक संसदीय प्रस्ताव है, जिसे विपक्ष द्वारा लोक सभा में केंद्र सरकार को गिराने या कमजोर करने के लिए रखा जाता है. यह प्रस्ताव संसदीय मतदान द्वारा पारित या अस्वीकार किया जाता है.

निंदा प्रस्ताव और अविश्वास प्रस्ताव में अंतर इस प्रकार है;

निंदा प्रस्तावअविश्वास प्रस्ताव
 1. यह प्रस्ताव किसी एक मंत्री, कई मंत्रियों और पूरे मंत्रिपरिषद के विरुद्ध लाया जा सकता है यह सिर्फ पूरे मंत्रिपरिषद के विरुद्ध लाया जा सकता है.
 2. लोक सभा में इसे स्वीकारने का कारण बताना जरूरी होता है. लोक सभा में इसे स्वीकारने का कारण बताना जरूरी नहीं होता है.
 3. यह मंत्री परिषद् की कुछ नीतियों या कार्यों के खिलाफ निंदा के लिए लाया जाता है. यह लोक सभा में मंत्रिपरिषद के बहुमत को देखने के लिए लाया जाता है.
 4. यदि यह लोक सभा में पास हो जाता है तो मंत्रिपरिषद को त्याग पत्र देना आवश्यक नहीं होता है. यदि यह लोक सभा में पास हो जाता है तो पूरी मंत्रिपरिषद को त्याग पत्र देना आवश्यक होता है.

ऊपर दिए गए बिन्दुओं के आधार पर यह कहा जा सकता है कि निंदा प्रस्ताव और अविश्वास प्रस्ताव में मुख्य अंतर यह है कि यदि निंदा प्रस्ताव पारित हो जाता है तो सरकार को किसी तरह का खतरा नहीं होता है लेकिन यदि अविश्वास प्रस्ताव पास हो जाता है तो सरकार गिर जाती है.

  • निंदा प्रस्ताव-
    • यह कड़ी अस्वीकृति या कठोर आलोचना की अभिव्यक्ति है।
    • यह सरकारी नीतियों की नीतियों के खिलाफ आम विरोध है।
    • प्रस्ताव में सरकार के खिलाफ आरोपों का उल्लेख होना चाहिए।
    • अध्यक्ष ने फैसला किया कि प्रस्ताव क्रम में है या नहीं।
    • यदि कोई निन्दा प्रस्ताव पारित किया गया है तो सरकार को पारित होने के बाद तुरंत सदन का विश्वास प्राप्त करने की आवश्यकता है।
    • इसे अपनाने का कारण लोकसभा में बताया जाना चाहिए। 
    • इसे एक व्यक्तिगत मंत्री या मंत्रियों के समूह या पूरी मंत्रिपरिषद के खिलाफ पेश किया जा सकता है। 
    • विशिष्ट नीतियों और कार्यों के लिए मंत्री या परिषद की निंदा करने के लिए।
    • लोकसभा में पारित होने पर मंत्रिपरिषद को इस्तीफा देने की आवश्यकता नहीं है। 

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